Author Topic: पिया मिलन की बेला है  (Read 48 times)

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Sahil

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पिया मिलन की बेला है
« on: December 18, 2014, 05:53:33 PM »
रात अलबेली सी चली इठलाती
कल पिया मिलन की बेला है
 
थी खड़ी वो चंदा तांक रही
हर घडी बड़ी बेताब रही
कल पिया मिलन की तैयारी है
हर पल अब लगता भारी है
ऐ चाँद कहीं तू अब छुप जा
ऐ रात सुन अब तू भी घर जा
अब सुबह नयी हो जाने दो
नए सपने उसे सजाने दो
आँखों में नींद ना दिखती है
करवट हर इक पल बदलती है
अब ये सब्र और ना होता है
कोई आँखों में ख्वाब पिरोता है
एक नए ख्याल में खोयी हुई
आधी जागी या सोयी हुई
चांदनी में चमक रहा था यौवन
था होश गुम और खो गए लोचन
एक दम से शीतल हवा चली
इक लट ना जाने कहाँ उडी
फिर होश संभाल शरमाई वो
अपनी बांह जकड अलसाई वो
सपनो कि एक बारात चली
कुछ इसी उमंग में रात कटी
जीवन लगता नया नवेला है
कल पिया मिलन की बेला है

 

 

चुनरी किस रंग की ओढूं मैं
केश बाधुं या खुले ही छोडूं मैं
सखी ज़रा श्रंगार तो कर
साजन के लिए तैयार तो कर
रूप में मेरे बस खो जायें
वो पिया मेरे बस हो जायें
ना इस तरह देख तू नज़र लगा
सखी ज़रा काजल तो लगा
जब मैं उनसे मिलने जाउंगी
हाय कुछ कह भी मैं पाऊँगी
ह्रदय में सहस्त्र सवाल भरे
पर जीह्वा ना कष्ट ये चार करे
पूछूंगी बरसों कहाँ रहे
कहो पिया तुम कहाँ रहे
तुम बिन कैसे ये दिन काटे
थे अश्रु बहे जगी सारी रातें
ना मुख से मैं चुनरी हटाउंगी
कुछ तो उन्हें भी तड़पाऊँगी
बाँहों में न भर लें साजन मुझको
हाय लज्जा से ही मैं मर जाउंगी
अरे समय बहुत अब हो चला
हट पगली! बातों में ना लगा
जीवन में हुआ नया सवेरा है
आज पिया मिलन की बेला है
 

 

 
नैनन के तेज कतार हुई
सजनी सोलह श्रृंगार हुई
आँखों में उसने जो काजल लगाया
अमावस में चाँद उतर के आया
माथे पर चंदा चमक रहा
गालों  से गुलाब झलक रहा
थी लबों पे लाली दहक रही
सीने में ज्वाला बहक रही
चुनरी में सितारे लपेटे हुई
साजन के रंग वो रंगी हुई
कानो पे लटा यूँ छाई हुई
जैसे नागन बलखाई हुई
रेशमी केशों की बारात चली
गजरे में लिपट कर रात चली
पीतल की बाली जब कर्ण हुई
उसके रूप से दमक स्वर्ण हुई
सोने के आभूषण फीके पड़े
खुद पारस कभी साज धरे !!
गले में हार कोई ना माला सी है
वो दो बाहों की प्यासी है
हाथों की चूड़ी बजी खन खन
चांदी की पायल बजी छन छन
सीने पे कोई कटार चली
जब पलक उठी जब पलक झुकी
स्वम कामदेव लज्जाये हुए
उसके रूप के आगे मुरझाये हुए
नहीं गौर वर्ण कुछ सांवल सी
मंदिर के महकते संदल सी
वो सुन्दरता की परिभाषा है
वो एक अपूर्ण अभिलाषा है
लगा इन्द्रधनुष पे मेला है
आज पिया मिलन की बेला है

 

 
माथे पर अजब वो तेज लिए
भौहों पे एक संतोष लिए
आँखों में भर भर प्रेम लिए
मुस्कान बड़ी विशेष लिए
लगाने विरहा पर पूर्ण विराम
जैसे मीरा से मिलने आये श्याम
जैसे मीरा से मिलने आये श्याम
नैनो से जब थे नैन मिले
अरसे के बाद जैसे चैन मिले
आँखों के इशारे सवाल हुए
पलकों के सहारे जवाब हुए
वो दो पंछी जो मिल बैठे
बगिया में गुल थे खिल बैठे
कांधों पे हथेली को रखकर
माथे को बढ़कर चूम लिया
इस इक पल में जैसे उसने
एक कालचक्र को घूम लिया
बाँहों में घुल गयी साजन के
एक दूजे में खुद को समा दिया
जीवन में पवित्र प्रेम को पाकर
बाकि सब तुच्छ था गँवा दिया
अब यही मोह है यही मोक्ष है
यही प्राण है यही जीवन
वो कौन प्रेमी है कौन प्रेमिका
सब तेरा मेरा है दर्पण
कैसे सब कुछ व्यक्त करूँ
असंख्य भावों का रेला है
ये पिया मिलन की बेला है

 

ये पिया मिलन की बेला है

anilrana

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Re: पिया मिलन की बेला है
« Reply #1 on: December 22, 2014, 01:20:33 PM »
wah kaaya baat hai
Ye Dunia Mujhe Jane Ya Na Jane,
Teri Ankhe Muje Pehchane Yahi Bahut Hai.

Rashmi

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Re: पिया मिलन की बेला है
« Reply #2 on: December 22, 2014, 02:54:28 PM »
Waah sahil .....pahle to itni lambi nazam likhne ke liye vadhaai....kahin kahin to aise laga ..jaise anupam saundraya ki koi raani sanmukh aa khadi ho...bahut khoob ... aate rahiye likhte rahiye
Rashmi Sharma

gooDe akkhar ,fatti sukki
adiyo meri gaachi mukki
sukke hanjhu akkhaN waale
haaDa! akkhar mooloN kaale

Sahil

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Re: पिया मिलन की बेला है
« Reply #3 on: January 08, 2015, 06:06:18 PM »
thanks Rashmi ji and Anil ji

ridham

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Re: पिया मिलन की बेला है
« Reply #4 on: January 17, 2015, 09:53:09 AM »
waaah ji kya kahne