Author Topic: ’’सारे जहॉ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’’  (Read 24 times)

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Musaahib

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’’सारे जहॉ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’’ के रचयिता सर मुहम्मद इकबाल
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(जन्म दिन ९ नवंबर पर)
दुनिया में शायद ही कोई ऐसा उर्दू भाषी और हिन्दी भाषी इन्सान होगा जिसने सर मुहम्मद इकबाल का लिखा हुआ हिन्दुस्तानी कौमी तराना ’’सारे जहॉ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’’ न सुना हो। हालांकि सर इकबाल दुनिया की अनेक भाषाओं के जानकार थे और उनके कारनामों की लिस्ट बहुत लम्बी हैं किन्तु सिर्फ उनका लिखा हुआ हिन्दुस्तानी कौमी तराना ’’सारे जहॉ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’’ उनको याद करने के लिये काफी है। शायद ही कोई हिन्दुस्तानी ऐसा होगा जिसने कभी इस नगमे को गुनगुनाया न हो। हिन्दुस्तान के उन इलाकों में जहां उर्दू और हिन्दी जानने वाले लोग रहते है शायद ही कोई ऐसा स्कूल, मदरसा या विद्यालय होगा जहॉ यह तराना न गूंजा होगा।
हिन्दुस्तानी कौमी तराने ’’सारे जहॉ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा’’ के रचयिता महान दार्शनिक, वकील, शायर, लेखक और राजनीतिज्ञ सर मुहम्मद इकबाल हालाँकि पाकिस्तानी नागरिक थे। किन्तु हिन्दुस्तानियों के लिये यह गौरव का विषय है कि जब उनका जन्म सियालकोट में हुआ था तब वे भारतीय थे और बाद में हिन्दुस्तान की आज़ादी के सिपाही बनकर उन्होंने अंग्रेजी शासन का विरोध किया. जन्म के लिहाज से इकबाल भारतीय मूल के इन्सान हैं, क्योंकि उनका जन्म ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रान्त में, सियालकोट में 9 नवम्बर 1877 को हुआ था जो अब पाकिस्तान में है किन्तु जन्म के समय अविभाजित भारत में था। उनके दादा कश्मीरी पण्डित थे। वे कश्मीर के सप्रू मूल के ब्राहमण थे तथा जब कश्मीर में सिक्खों का शासन था, उनका परिवार पंजाब के लिये पलायन कर गया था।
सर इकबाल ने अपने कश्मीरी पण्डित होने का जिक्र अपने लेखन में अक्सर किया है। यही कारण है जितना पाकिस्तानी नागरिक सर इकबाल का सम्मान करते हैं उससे अधिक हिन्दुस्तानी उनका सम्मान करते हैं। वास्तव में सर इकबाल जैसे लोगों को किसी खास राष्ट्र की सीमाओं में कैद नहीं किया जा सकता। वे अन्तराष्ट्रीय स्तर पर सर्वमान्य व्यकित्व के मालिक थे। दक्षिण एशिया और उर्दू जगत में सर इकबाल को शायर-ए-मशरिक़ यानि पूरब का शायर माना जाता है। उन्हें मुफक्किर-ए-पाकिस्तान यानि पाकिस्तानी चिन्तक तथा हकीम-उल-उम्मत यानि उम्मत के सुधारक रूप में याद किया जाता है। पाकिस्तान में उनका जन्म दिन 9 नवम्बर इकबाल डे के रूप में हर वर्ष धूमधाम से मनाया जाता है तथा इस दिन वहॉ सार्वजनिक अवकाश होता है। ईरान और अफगानिस्तान में वे इकबाल-ए-लाहौरी के नाम के मशहूर हैं और उनकी शायरी वहॉ की आवाम के द्वारा बहुत पसन्द की जाती है।
सिर्फ मुस्लिम देशों और मुस्लिम जगत में उनकी मान्यता नहीं बल्कि दुनिया के विभिन्न मुल्कों में उनको सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। यूनाइटेड स्टेट सुप्रीम कोर्ट के ऐसोसियेट जस्टिस विलियम ओ. डगलस के अनुसार उनके विचार अन्तर्राष्ट्रीय पहचान रखते हैं। सोवियत रूस के एन.पी. एनिकोय ने अपनी आत्म कथा में उनके विचारों को असमानता, भेदभाव के विरूद्ध तथा आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, राष्ट्रीय, वर्गीय और धार्मिक हर क्षेत्र में उल्लेखनीय माना है। शायरी के अलावा सर मुहम्मद इकबाल महान दार्शनिक, वकील, शायर, लेखक और सियासतदां भी थे। देश विदेश में उन्होंने उच्चस्तरीय तालीम हासिल की और दुनिया की विभन्न भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। सर इकबाल इस्लामी चिन्तक के रूप में अपनी एक अलग पहचान रखते हैं और इस्लाम के प्रचार प्रसार में उनका विशेष रोल है। उन्होंने इस्लाम दर्शन पर बहुत सारी तार्किक और वैज्ञानिक व आधुनिक सोच पर आधारित पुस्तकें लिखीं हैं।
अंग्रेजी ,उर्दू, अरबी, फारसी, हिन्दी और दुनिया की अन्य ज़बानों के लिटरेचर में सर मुहम्मद इकबाल को बहुत इज्जत की नज़र से देखा जाता है। उन्हें उर्दू साहित्य में, उर्दू, फारसी दोनों ज़बानों का बहुत खास रचनाकार माना जाता है। हिन्दुस्तानी नागरिकों के अलावा पाकिस्तानी, अफगानी और ईरानी और दूसरे अन्तराष्ट्रीय साहित्यकारों की नज़रों में एक महत्वपूर्ण साहित्यिक और सांस्कृतिक शायर माने जाते हैं। हालांकि इकबाल एक जाने माने शायर हैं मगर इसके साथ साथ वे मौजूदा दौर में उच्चस्तर के मुस्लिम दार्शनिक, चिन्तक भी हैं। उनकी पहली शायरी की किताब असरार-ए-खुदी फारसी में 1915 में प्रकाशित हुई थी और अन्य किताबें रूमज़-ए-बेखुदी, पयाम-ए-मशरिक़ और ज़बूर-ए-आज़म हैं। इसके अलावा उर्दू को उनकी सबसे अच्छी देन बांग-ए-दरां, बली-ए-जिबरील, ज़र्ब-ए-कलीम व अर्मुगन-ए-हिजाज़ हैं।
हिन्दुस्तान के लिये उनकी सबसे बड़ी देन तराना-ए-हिन्द ’’सारे जहॉ से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा है’’। यह तराना लगभग 1 सदी से हिन्दुस्तान में लोकप्रिय है। कहा जाता है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने, जब वे यरवदा जेल में बन्द थे, इस तराने को लगभग 100 बार से ज्यादा बार गाया था। यह गीत 1950 में सितारवादक रविशंकर द्वारा संगीतबद्ध किया गया था और लता मंगेशकर द्वारा स्वरबद्ध कर रिकॉर्ड किया गया थां। इसके शेर नं0 (१) सारे जहॉ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा, हम बुलबलें हैं इसकी ये गुलिस्तां हमारा, शेर नं0 (३) पर्वत वो सबसे ऊंचा हमसाया आस्मां का, वो सन्तरी हमारा वो पासवां हमारा, शेर नं0 (४) गोदी में खेलतीं हैं जिसकी हज़ारों नदियां, गुलशन है जिनके दम से रसकेजनां हमारा, और शेर नं0 (६) मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना, हिन्दी है हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा, राष्ट्रप्रेम की जिस स्तर की भावनाओं से ओतप्रोत हैं, उसके आधार पर राष्ट्रगान के शेरों की अहमियत रखते हैं।
ताहम दुनिया में बहुत कम व्यक्ति ऐसे होंगे जो एक साथ कई ऐसे राष्ट्रों के नागरिकों के बीच समान रूप लोकप्रिय और मान्यप्राप्त हैं जिनकी संस्कृति, आचार विचार, सिद्धान्तों और मानदण्डों में बुनियादी अन्तर है। सर मुहम्मद इकबाल ऐसे ही व्यक्तित्व के धनी थे। खासकर दो ऐसे मुल्कों जिनके दरम्यान जन्मज़ात दुश्मनी है उन दोनों मुल्कों में इकबाल उनके अपने बुजुर्ग और साझा सास्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के पोषक माने जाते है। इस्लाम धर्म और मुस्लिम समाज से ताल्लुक रखने के बावजूद हिन्दुस्तान ही नहीं दुनिया भर में बसने वाले हिन्दु मूल के नागरिक उन्हें अपना ऐतिहासिक और सांस्कृतिक बुजुर्ग मानते हैं। सर मुहम्मद इकबाल के व्यक्तित्व की यह खूबी उन्हें दुनिया के महान व्यक्तियों में पहली पंक्ति का व्यक्ति बनाती है।
ज़हीर ललितपुरी ( Source Facebook Page Ek Sher Aapke Naam)