Author Topic: मुक़म्मल हो जाता तो ख़त्म हो जाता  (Read 34 times)

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Sajjan Singh

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मुक़म्मल हो जाता तो ख़त्म हो जाता,
फिर कोई एहसास रातों को ना जगाता
ना होने की हैं सारी शायरियां और नज़्में
होने पर तो कोई शब् की स्याही ना जलाता
हर बूँद में साक़ी ने कुछ माज़ी है मिलाया
हर घूँट में रातों को गले से है उतारा
कुछ सोचा और फिर सर को झटक दिया
ज़हन की धूल को कागज़ पर गिरा दिया
रात भर जो खिड़की पर टंगा रहा,सुबह सूरज ने उसको जला दिया
एक ख़याल एक चेहरा एक शहर एक किस्सा मुक़म्मल होते ही पिघल कर बह गया।