Author Topic: तिश्नगी मुख़्तसर नहीं यारब  (Read 122 times)

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Sagar

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तिश्नगी मुख़्तसर नहीं यारब
है कोई चारागर नहीं यारब

दर-ब-दर बेसबब बसर क्यूँ  हो
ग़र मेरा कोई घर नहीं यारब

मैं अकेला ही कारवाँ क्यूँ हूँ
मुझमें बाक़ी सफ़र नहीं यारब

(क्यूँ सुनाता है दास्ताँ जिसमें ) edit
क्यूँ सुनूं मैं दास्ताँ जिसमें
इश्क़ की ज़ेर-ओ-ज़बर नहीं यारब

~Sagar
« Last Edit: August 06, 2014, 10:02:04 AM by Sagar »
मोमिन न मैं फ़िराक न ग़ालिब न मीर हूँ
इक आग का गोला हूँ मैं अर्जुन का तीर हूँ

Rashmi

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तिश्नगी मुख़्तसर नहीं यारब
है कोई चारागर नहीं यारब

दर-ब-दर बेसबब बसर क्यूँ  हो
ग़र मेरा कोई घर नहीं यारब

मैं अकेला ही कारवाँ क्यूँ हूँ
मुझमें बाक़ी सफ़र नहीं यारब

क्यूँ सुनाता है दास्ताँ जिसमें
इश्क़ की ज़ेर-ओ-ज़बर नहीं यारब

~Sagar
as usual awesome ,,,,,,god bless
Rashmi Sharma

gooDe akkhar ,fatti sukki
adiyo meri gaachi mukki
sukke hanjhu akkhaN waale
haaDa! akkhar mooloN kaale

Venus Sandal

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Hmmm

Achi gazal hui he
zoya****

Lau  hi lau sii ..... saik nhi si
Vekh lya main jugnu phd ke
:-Meesa.

vipulyaara

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Re: तिश्नगी मुख़्तसर नहीं यारब
« Reply #3 on: October 28, 2014, 04:20:52 PM »
अच्छी ग़ज़ल है साग़र साहब।

"है कोई चारागर नहीं यारब" इसे यूँ लें "अब कोई चारागर नहीं यारब"

* गर मेरा कोई घर नहीं यारब

और आख़िरी शेर का मिसरा-ए-सानी भी ख़ारिज-अज़-बह्र है।
( और दास्ताँ सुनाने में ज़ेर-ओ-ज़बर होना भी अच्छी तरक़ीब नहीं। )

कहते रहिये।  ख़ुश रहिये।
Meer-o-Ghalib kya, k ban paaye nahiN Faiz-o-Firaq
zam ye tha k Rumi-o-Attaar ban jaayenge ham

[Faraz]

vsm1978

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Re: तिश्नगी मुख़्तसर नहीं यारब
« Reply #4 on: November 26, 2014, 04:58:47 AM »
मैं अकेला ही कारवाँ क्यूँ हूँ
मुझमें बाक़ी सफ़र नहीं यारब  - behterin Sagar Saheb.

Sahil

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Re: तिश्नगी मुख़्तसर नहीं यारब
« Reply #5 on: December 18, 2014, 06:12:00 PM »
waah kya kehne..

vsm1978

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Re: तिश्नगी मुख़्तसर नहीं यारब
« Reply #6 on: December 22, 2014, 07:24:09 AM »
दर-ब-दर बेसबब बसर क्यूँ  हो
ग़र मेरा कोई घर नहीं यारब  :) wahhhh. umda