Author Topic: उन दिनों तुम न थे  (Read 55 times)

0 Members and 1 Guest are viewing this topic.

Sagar

  • Sr. Member
  • ****
  • Posts: 326
  • Gender: Male
  • Be melting snow~ Rumi
उन दिनों तुम न थे
« on: July 28, 2014, 06:53:35 PM »
जिन दिनों उम्र पर तन्हाई का बुखार था
टूटता शरीर और ह्रदय तार-तार था
चिलचिलाती धूप में छाँव ढूँढता था मैं
वीरानी पड़ी बस्तियों में गाँव  ढूँढता था मैं
मेरे हर इक स्वप्न पर वक़्त का प्रहार था
उन दिनों तुम न थे
उन दिनों तुम न थे

रक्त-लेप भाल पर
मैं समय की ताल पर
गर्त नापता गया
अंतर झाँकता गया
समाज रुष्ठ जब हुआ मेरे हर सवाल पर
उन दिनों तुम न थे
उन दिनों तुम न थे

स्वाभिमान हार कर असहाय था जब पड़ा
जागता था रात-रात, शोक था जब बड़ा
साँस-साँस में एक बस ही पुकार थी
हार स्वीकार थी, मौत की गुहार थी
निर्वस्त्र बीच बाज़ार में सर झुका था मैं खड़ा
उन दिनों तुम न थे
हाय! तब तुम न थे

दोष शास्त्र ने मढा जब हाथ की लकीर पर
कुंडली भी हंस पड़ी भाग्य के फ़कीर पर
युद्ध ही जब बचा आखिरी विकल्प था
और मैं बढ़ चला ह्रदय लिए संकल्प था
जब हँसा वो योद्धा मेरे खाली तुनीर पर
हाय! तब तुम न थे
उन दिनों तुम न थे

-----------------------
तुनीर: quiver... teer andaaz jis cheez me teer rakhte theN pehle.. jise peeth ke baandhte the.. usse tuneer kehte hain..
शास्त्र: aakhiri stanza me शास्त्र.. "hast rekha viyaag" ko kahaa hai
 
Ye kavita Neeraj ji ki kavitaa "kaarvaaN guzar gaya gubaar dekhta raha" ko padhne pe baad likhi thi maine... ek rhythm tha us kavita me jo mere mann ke uss waqt ke baavoN ko lekar jab kaagaz pe aaya.. to is kavitaa ke roop me aaya..
originally ye maine apne blog pe share ki thi.. aaj kuchh changes kar ke yahaaN share kar raha hun..

http://www.chakreshblog.blogspot.in/2010/10/blog-post_25.html

-------------------------------------------------------------------

~Sagar
« Last Edit: July 28, 2014, 06:56:28 PM by Sagar »
मोमिन न मैं फ़िराक न ग़ालिब न मीर हूँ
इक आग का गोला हूँ मैं अर्जुन का तीर हूँ