Author Topic: साँसों की बूंदे  (Read 52 times)

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Sajjan Singh

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साँसों की बूंदे
« on: July 23, 2014, 04:30:54 PM »
साँसों की बूंदे टपक कर शोर करती हैं
कभी जिस्म पर घाव करती हैं तो कभी रूह को बेगाना करती हैं
टेढ़े मेढ़े रास्तों पर भटक कर घूमती फिरती तुम्हारे दर को ढूंढती हैं
जब कभी तुम सामने आओगे
तो कुछ बूँदें तुम्हारे सुर्ख रुखसार पर गिरकर धुआं बन जायेंगी
और आखिरी बूँद तुम्हारे क़दमों में टपक कर एक मुकम्मल दास्ताँ बन जाएगी।

Sagar

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Re: साँसों की बूंदे
« Reply #1 on: July 23, 2014, 04:34:51 PM »
तो कुछ बूँदें तुम्हारे सुर्ख रुखसार पर गिरकर धुआं बन जायेंगी

waah ... bahot khoob..
मोमिन न मैं फ़िराक न ग़ालिब न मीर हूँ
इक आग का गोला हूँ मैं अर्जुन का तीर हूँ