Author Topic: उनका ख़त ….मेरी ज़ुबानी !  (Read 229 times)

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Venus Sandal

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इस  जलती  धुप  में  पल  में  सारा  आलम  गुलाबी  हो  गया …घर  में  कदम  रखते  ही  देखा .इक  गुलाबी  सा  ख़त  धुप  को  जला  रहा  था .! हाथ  छुते   ही .लपक  के  दिल  से  लग   गया ..पहचान  लिया  किधर   से  आया  है   ये ! वही  नदी  सी  बल  खाती  लिखावट ..और  हर  शब्द  करीने  से सजा  के  लिखा  हुआ ! दिन  भर  की  थकावट  ने  कहा ,'' पहले  ..इक  चुस्की  चाय की दे दो मुझे …..फिर  देख  लेना  इसे ..''
पर  ख़त  भी  उनका  उन  जैसा  उतावला .फट  से  गौद  में  आ गिरा ,,,,,,,जैसे  कह  रहा  हो ….नहीं  ....पहले ""  मैं ""! ख़त  खोलते  ही ….वो  ही  खुशबू ..जो  तुम्हारे  बालों  से  आती  है  ! ना  जाने  कितनी  रातें  इसपे  सो   के  गुजारी  होंगीं   तुमने !
 न  नाम  मेरा  .ना  कोई  दुआ ..न  कोई  सलाम ...


“”कैसी  हो ””


फिर  छोड़   दीं उस  पन्ने   की  2 -3 कतारें …तुम्हारी  कश्मकश  में  ना  जाने  इन  कतारों  ने कितना  अकेलापन  सहा  होगा ..हौंसला  कर  आगे  लिखा  होगा  तुमने ………..

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आज  जानती  हो  क्या  हुआ ….बस  कुछ  लिखने  के  लिए  कुछ  ढूंढ़   रहा  था  के  तुम्हारी  पेंसिल  हाथ  आ  गयी फिर  जो  लिखना  था वो  भूल  गया ..! कभी  बताया  नही  तुम्हे मैंने  पर .. तुम्हारी  इस  पेंसिल  से  बहुत  जलन  थी  मुझे ..पर  आज  इस  से  अज़ीज़  कुछ  ना  लगा ! याद  है  तुम  कैसी  लापरवाही  से  अपने  खुले  बालों  को टेढ़े  मेढ़े  जुड़े  का  आकार दे  दिया  करती  थी ….और  इसी  पेंसिल  के  सहारे  टिका  लेती ! मैं  तो  बस  इसी  इंतज़ार  में  रहता   की  तुम  इसे  बालों  में  अटकाओ   ... और  मैं ..निकालूं ! माथे  पर  कैसे  बल  डाल लेती थी  तुम …. पर  मेरी  नज़र  तो  तुम्हारे  बालों  की  तरफ  होती    ! उनका  खुल  के  बिखरना ….और  फिर  तुम्हारी  कमर  से  लिपट  जाना ...जैसे  रेशम  की  सुन्हेरी  तारों  का  गुछा  अचानक  से  खुले और  तुम्हारी  कमर  पे  अटक जाए !

और  वो  इक  और  आदत  तुम्हारी …
पेंसिल  को  दांतों  में  दबाते  रहना ..तुम्हारी  सोच  के   साथ  ..वो  पेंसिल  भी  न  जाने  कितने  रंग  देखती  रहती ..कभी  होंठो  पे  अटक  जाती  .कभी  पिसती  थी  दांतों  में …कभी  कर  देती  थी  तुम  इसी  अपने  होंठो  से  जुदा  और  माथे  पर  टिका  देती  ! 
मुझे  यूँ  घूरते   देख  ..पूछा    था  तुमने  इक  बार ..””क्या  घूरते रहते हो ””

इक  मुस्कराहट  के  सिवा  मैं …..कहता  भी  क्या ?
क्या  ये  की  मुझे  अपनी  पेंसिल  बना  ..लो मैं  भी  चूमूं  , तुम्हारा  माथा  .कभी  तय  करूं  सदियों  का  फासला  तुम्हारे   होंठो  और  तुम्हारे   माथे  के  बीच  .,कभी  अटकुं   तुम्हारे  जुड़े   में ..सौउं  मैं  भी  रेशम  की तारों  में  ...करूं   ब्यान  तुम्हारी  सोच  अपने  खून  से .. या रहूँ  झूलता  मैं  तुम्हारी   उँगलियों  में !

हम्मम्मम्म !
अच्छा   सुनो   मेरी  इक  बात  ही  मान  लो  ..हर  शाम  मेरे  साथ  अपनी  पेंसिल  का  सौदा  कर  लिया  करो ..दिन  भर  रखो  अपने   पास …शाम  को  मेरी  कलम  से  बदल  लिया  करो .इसी  बहाने  हर  शाम  मैं  तुम्हे  महसूस  कर  लिया  करूंगा ...छु लिया करूंगा ! और  मेरी  कलम  से  थोडा  सा  मैं  तुम  तक  पहुँच  जाया   करूंगा  ………

तुम्हारा............!



                                                      जोया ****
zoya****

Lau  hi lau sii ..... saik nhi si
Vekh lya main jugnu phd ke
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Rashmi

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Re: उनका ख़त ….मेरी ज़ुबानी !
« Reply #1 on: May 30, 2014, 08:10:58 AM »
Waaaah zoya itna khoobsoorat khat....jaise laga ke kash ye khat mujhe mila hota or maine barson ise sambhala hota.....wahi saari baatein jo aksar shamil hoti hain ek ourat ke mizaz mein kitni khoobsoorat bana di vo sadharan adaayein tumhare is khat ne ....aise hi likhti raho
Rashmi Sharma

gooDe akkhar ,fatti sukki
adiyo meri gaachi mukki
sukke hanjhu akkhaN waale
haaDa! akkhar mooloN kaale

Venus Sandal

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Re: उनका ख़त ….मेरी ज़ुबानी !
« Reply #2 on: May 30, 2014, 03:20:19 PM »
Waaaah zoya itna khoobsoorat khat....jaise laga ke kash ye khat mujhe mila hota or maine barson ise sambhala hota.....wahi saari baatein jo aksar shamil hoti hain ek ourat ke mizaz mein kitni khoobsoorat bana di vo sadharan adaayein tumhare is khat ne ....aise hi likhti raho



Rashmi jii

Bahuttttttttt bahutt dhanywaad

Hmmm..ye lekh mere dil ke utne hi kreeb he jitni ki dhadkan. .

aaapke itneeeee ptaare shabdo k liye ..thanx a tonn
zoya****

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Shafaq

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Re: उनका ख़त ….मेरी ज़ुबानी !
« Reply #3 on: May 30, 2014, 08:50:27 PM »
आहा... क्या खूबसूरत ख़त है ... लाजवाब

Reeta tyagi

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Re: उनका ख़त ….मेरी ज़ुबानी !
« Reply #4 on: May 31, 2014, 05:00:17 AM »
Joya
Very touchyy :)

Venus Sandal

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Re: उनका ख़त ….मेरी ज़ुबानी !
« Reply #5 on: June 01, 2014, 03:36:58 AM »
आहा... क्या खूबसूरत ख़त है ... लाजवाब

Thanx shafaq ji
zoya****

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Venus Sandal

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Venus Sandal

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Re: उनका ख़त ….मेरी ज़ुबानी !
« Reply #7 on: June 01, 2014, 03:39:10 AM »
Fikr ji

:)


zoya****

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ChakreshSingh

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Re: उनका ख़त ….मेरी ज़ुबानी !
« Reply #8 on: June 01, 2014, 07:43:40 PM »
:-)) Zoya ji .. itana khoobsoorat prose nahi padha tha maine kabhi..

shibli sana

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Re: उनका ख़त ….मेरी ज़ुबानी !
« Reply #9 on: July 13, 2014, 02:19:53 AM »
bahut khubsurah khat zoya ji.. Har aurat chahegi kaash ye khat uuse mile..