Author Topic: अब अकेले चला नहीं जाता  (Read 82 times)

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Sagar

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अब अकेले चला नहीं जाता
« on: July 12, 2014, 06:28:28 AM »
एक सब कुछ भुला देनी वाली सांझ मेरे घर की दहलीज पर आ बैठी...

मैं छज्जे के नीचे बैठा, पाँव पसारे ढलती सांझ के सिमटते फैलाव और आसमान के धीरे धीरे सिंदूरी से स्याह होते महोत्सव में
अपने भीतर के एक एक स्वप्न, एक एक संगी-साथी, एक एक शब्दों को धुँवा होते महसूस करता रहा

सोचता रहा कि दिन भर के समारोह के महान समापन पर कैसे साथ की सभी कुर्सियां खाली हो जाती हैं
और साथ के सभी श्रोता कहाँ चले जाते हैं

भूल जाना कितना आसान होता है
बस एक साँझ ढलते सूरज संग डूबती साँसों को गिनना भर तो होता है

स्वयं को अपने अस्तित्व की छणभंगुरता पर कितना भरोसा होता है कभी कभी

पर अब अकेले चला नहीं जाता
मोमिन न मैं फ़िराक न ग़ालिब न मीर हूँ
इक आग का गोला हूँ मैं अर्जुन का तीर हूँ

Rashmi

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Re: अब अकेले चला नहीं जाता
« Reply #1 on: July 12, 2014, 07:23:59 AM »
EhsaasoN ko kitne khoobsurat shabdoN se nawaaja hai.....bahut khoob Saagar...bahut khoob
Rashmi Sharma

gooDe akkhar ,fatti sukki
adiyo meri gaachi mukki
sukke hanjhu akkhaN waale
haaDa! akkhar mooloN kaale

Jashn

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Re: अब अकेले चला नहीं जाता
« Reply #2 on: July 12, 2014, 10:04:23 AM »
BAHOT LAJAWAAB WAAHHHH

Sagar

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Re: अब अकेले चला नहीं जाता
« Reply #3 on: July 24, 2014, 11:43:10 PM »
Thanks a lot..
« Last Edit: July 24, 2014, 11:50:05 PM by Sagar »
मोमिन न मैं फ़िराक न ग़ालिब न मीर हूँ
इक आग का गोला हूँ मैं अर्जुन का तीर हूँ