Author Topic: तुमने कभी सूफी दरवेषों को देखा है ?  (Read 33 times)

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Mukesh Srivastava

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सुमी,

तुमने कभी सूफी दरवेषों को देखा है ?
अपनी मस्ती में मस्त मगन नाचते हुये, गाते हुये, अपने लम्बे चोंगेनुमा लबादा पहने हुये। गर नही देखा तो देखना, गर मौका मिले तो। तुम देखोगी तो इन सूफी दरवेषों के न्त्य में एक इनर हारमॅनी होती है। एक अलहदा किस्म की रवानी होती है, रुहानी किस्म की खुषबू मिलेगी जिसमें अलग मस्ती होती है? अलग किस्म की लय होती है। जिसे सिर्फ और सिर्फ देखने भर से एक नये किस्म का शुकूं मिलता है। एक अलौकिक आनन्द होता है। जिसमें एक बार डूब जाने के बाद उबरने का मन ही नही होता है। बस लगता है कि अब तो बस इन्ही के साथ नाच लो, गा लो, थिरक लो, झूम लो और एक हो जाओ उस रुहानी ताकत के साथ जिसका जिस्म से नही रुह से नाता है। सच्चाई से नाता है मुहब्ब्त से रिस्ता है। जिसक उस परमपिता से नाता होता है जिसका कोई रुप नही होता है। जो सब जगह हो कर भी नही होता। जो अनुभव मे आता भी है और नही भी आता है।
सच, सुमी, अगर तुम इन दरवेषों को देखोगे नाचते गाते तो इतना जरुर तय है कि तुम कुछ पलों के लिये ही सही उस परमसत्ता की खुषबू से रुबरु जरुर हो जाओगी। पल दो पल को ही हो मगर मुलाकात जरुर हो जायेगी जिसकी खुषबू तुम्हारी रुह को एक ऐसे इत्र से नहला देगी जिसकी महक ताजिंदगी नही जायेगी। इसकी खुषबू फ़ारस और ईरान के इत्र की तरह नही हैं जो कुछ लम्हो या कुछ पलों बाद हवा में खो जाये।
सच सुमी, मुझे तो दरवेष बहुत लुभाते हैं इनका फक्कडपन इनका गीत इनका संगीत सब कुछ इतना अलौकिक होता है। जिसके आनन्द को दुिनया की कोई भाषा बयॉ नही कर सकती। यहां तक कि संस्कृत तक भी जो दुनिया की सबसे समृद्ध भाषा जानी जाती है।
और यही कारण हे आज मैने तुमसे इन दरवेषों के बारे में बात करनी चाही।
वैसे तो ‘सूफ’ का मतलब भेड के बाल से है। और एक मतलब पवित्र भी होता है। इस पंथ को मानने वाले वैसे तो सब पंथों और धर्मो को आदर भाव देते हैं पर किसी साकर या निराकार ईष्वर की अपेक्षा अपनी आत्मा को ज्यादा महत्व देते है। ‘अनहलक’ उना बृम्हवाक्य होता है। ये अपनी आत्मा को ही सब कुछ मानते है। ंऔर सच भी है। और सच भी है आत्मा ही तो है जो सच है बाकी तो सब कुछ छल है छलावा है झूठ है प्रपंच है माया है। ठगिनी है जिसके जल में हम ठगे जा रहे हैं युगों युगों से जन्मों जन्मों से। जिसे जानकारों न कहो ही है ‘माया महाठगिनी हम जानी’ तो सुमी अब मै और ज्यादा ठगा जाना बरदास्त नही कर सकता। और मै डूब जाना चाहता हूं उस अनहद के महानाद में महारस में महाआत्मा में।
हॉ अगर तुम भी ऐसा ही कुछ अनुभव लेना या पाना चाहती हो तो आओ एक बार प्रेम में एकाकार हो जाओ और झूम के नाचो गाओ मस्त हो जाओ। उस सूफी नृत्य में उस आत्म न्त्य में जहां महाआनन्द है प्रेम ही प्रेम है।

तुम्हारा

मुकेश इलाहाबादी