Author Topic: गुलज़ार साहब से मेरी पहली मुलाकात !  (Read 153 times)

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Venus Sandal

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रसायनों से लैस प्रयोगशाला से जैसे ही निकली

लैबअटेंडेंट ने फटाक से दरवाज़ा लगाया

जैसे मेरा गुस्सा दरवाज़े पे निकाल रहा हो

मानो घड़ी सिर्फ इनके लिए ही एक बजाती है

टाइम देखा अभी पुरे दस मि० बचे थे लंच ब्रेक को

इतनी देर में पांच सैम्पल्स सेट कर  सकती थी

मुहं टेढ़ा करने के सिवा  कर भी क्या सकती थी

जैसे ही चलने के लिए कदम आगे बढ़ाया

अपने से आती थायोयूरिया की बदबू

ने ताना दिया गर सुबह डियो रख लेती

तो  चलती फिरती लैब नही लगती ! खैर

झट से कैंटीन से चाय और बर्गर ले फटाफट खाया..

रीडिंग्स सेट की ..अगली रीडिंग्स के पेज सेट किये

और ठीक डेढ बजे लैब के आगे पहुँच गयी

दस मिं०  ...बीस मिं० ...तीस मिं०

पर लैबअटेंडेंट  महोदय का कुछ अता पता नही

फोन ट्राई  किया .......पर नदारद

समझ गयी फिर से फरलो !

यूनिवर्सिटी में इतने साल बिताने के बाद

इन सब की आदत सी हो गयी है !

अपना लश्कर उठाये मैं मेन लाइब्रेरी पहुँच गयी

चलो आज कुछ शोधपत्रो को ही खंगाल लूँ

ये सोच कोने के इक छुपे से बेंच पे डेरा डाल लिया

एक - डेढ़ घंटा शोधपत्रों से माथापच्ची की

फिर शोधपत्रों के आवरण से स्वयम को निकाल

कुछ क्षणों  के लिए  दोनों हथेलियों का सिरहाना बना

बस युहीं बैंच पर माथा टिका आँखें मूँद सो गयी   

अचानक इक पन्ने के फड़फ्ड़ाने की हल्की सी आवाज़ ने

मेरा ध्यान खींचा

इक नज़र डाली ....सर के बिलकुल पास ही

इक किताब पड़ी थी जिसके पन्ने पखें की हवा से

ज़दोज़ेहद कर रहे थे  फड़फ्ड़ाने के लिए

बस युहीं सर को बेंच पे टिकाये टिकाये

वो किताब खिंच ली .....क्यूँ ..??? पता नही

            "पुखराज ...गुलज़ार ..."

युहीं इक पन्ना खोल लिया

"मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे
;
मैनें तो ईक बार बुना था एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिराहे
साफ नजर आती हैं मेरे यार जुलाहे"...गुलज़ार "

बहुत देर तक इक सन्नाटा सा कोंधता रहा दिल ओ दिमाग में

वो सब बाते जिन्हें खुद से भी छुपा के किसी गहरे समन्दर में

दबा आई थी वो सारे दबावों की धकेलता हुआ बाहर आ गया

जाने कितना कुछ तेज़ तेज़ सा चलने लगना आँखों के सामने

कई महिने , हफ्ते , दिन , घंटे , पल  सब उलटी दिशा में मुड़ने लगे !

और शायद पहली बार मैं अपने अतीत पे रोई !

जो कभी नही किया और जो कभी करना भी नही चाहती थी

 शायद कमजोर नही बनाना चाहती थी !

ऐसा नही था की मैंने इस से पहले गुलज़ार जी को पढा नही था

या उनके गाने नही सुने थे समझे नही थे ...बल्कि बहुत पसंद भी थे

पर शायद उस दिन पहली बार गुलज़ार मुझसे मिले

और इक सगे की तरह मेरा ग़म बांटा और आँखों से बहाया

और तब से उस पहली मुलाकात के बाद

गुलज़ार साहब मेरे सबसे सगों में से… !
                                                                                    'जोया '
zoya****

Lau  hi lau sii ..... saik nhi si
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Rashmi

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are zoya kya likhti ho ....waaah kamaaal......kamàl hai aaapja gulzar se milna.... khush raho youn hi zindgi ke panne mehkaati raho
Rashmi Sharma

gooDe akkhar ,fatti sukki
adiyo meri gaachi mukki
sukke hanjhu akkhaN waale
haaDa! akkhar mooloN kaale

Venus Sandal

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are zoya kya likhti ho ....waaah kamaaal......kamàl hai aaapja gulzar se milna.... khush raho youn hi zindgi ke panne mehkaati raho


Hmmmm

Jaaanti hun rashmi ji...kuch khaas sa nhi he.....houslaa bdhaane k liye shukriya


Mgr mere liye bahutttt khaas

Bahut bahut dhanywaad
zoya****

Lau  hi lau sii ..... saik nhi si
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Venus Sandal

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Rana ji....hmmmmmmmmm
Thanx 
zoya****

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Bahut bahut dhanywaad
are aisa kyon kahti ho....comments dil se aate hain.... mujhe aapki lekhan shaily bahut priya hai
Rashmi Sharma

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Venus Sandal

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O thanx rashmi ji...
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ridham

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Badiya hai ji aapki ye mulaakaat

Venus Sandal

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Gulzar ji se he..bdhiyaa hi honi thi

Shukriya
zoya****

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