Author Topic: ummideiN  (Read 53 times)

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ridham

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ummideiN
« on: February 20, 2016, 02:28:56 PM »
दिन भर ऑफिस के काम में उलझी पर ध्यान घर में ही लगा था ..इक्क उम्मीद जैसे कोई आएगा ..कोई रूठा हुआ ...मुझे मनाने या  खुद मानने ..फिर सोचती थी नहीं ..तेरी ऎसी किस्मत कहाँ जो तेरे जज्वातो को कोई समझे ..फिर अपने आप को झुठलाती ..नहीं वो आएगा ..जरूर आएगा ..जैसे तैसे समय कटा ..घर आई तेज क़दमों से ..आते ही एक उम्मीद से अंदर आई ..ड्राइंग रूम में झाँका ...छन् की आवाज ... कुछ नहीं शोर था उम्मीद के टूटने का ...उफ़ ये उम्मीदें. ...