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Other language poetry => Kaavyanjali => Topic started by: Venus Sandal on July 30, 2014, 05:41:08 AM

Title: bas yun hi
Post by: Venus Sandal on July 30, 2014, 05:41:08 AM
"वक़्त रहता नही कहीं टिक के इसकी आदत भी आदमी सी है"


जाने गुलज़ार साहब कोंन से और किस वक़्त की बात करते हैं !
सालों गुज़र गये "इक वक़्त ऐसा है मेरा" जो गुजरता ही नही है

*******

इस वक़्त को भी अब कोसने का दिल नही करता
बेचारा जाने कब से खलाओं में युहीं भटक रहा है

इंसान तो फिर मर के इक बार कहीं टिक जाते हैं


Title: Re: bas yun hi
Post by: Rashmi on July 30, 2014, 04:55:25 PM
"वक़्त रहता नही कहीं टिक के इसकी आदत भी आदमी सी है"


जाने गुलज़ार साहब कोंन से और किस वक़्त की बात करते हैं !
सालों गुज़र गये "इक वक़्त ऐसा है मेरा" जो गुजरता ही नही है

*******

इस वक़्त को भी अब कोसने का दिल नही करता
बेचारा जाने कब से खलाओं में युहीं भटक रहा है

इंसान तो फिर मर के इक बार कहीं टिक जाते हैं
waaaaah naya khyaal nahi to insaan sara din waqt ko hi to kosta hai .....alag soch ,,,bahut khoob
Title: Re: bas yun hi
Post by: Venus Sandal on July 31, 2014, 04:23:15 AM
Fikr saahab..shukriya
Title: Re: bas yun hi
Post by: Venus Sandal on July 31, 2014, 04:24:23 AM
Thanx rashmii diii


Ik limit ke baad....shikaayten khtam ho jaati hain sabse...even khud se bhi

:)
:)
Title: Re: bas yun hi
Post by: Sagar on August 01, 2014, 07:05:23 AM
Badhiyaa hai
Title: Re: bas yun hi
Post by: Venus Sandal on August 01, 2014, 04:50:32 PM
Shukriya sagar ji