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Hindvi Poet Club => Gosha-e-Nazm => Topic started by: Rashmi on June 27, 2018, 10:45:49 PM

Title: Suno
Post by: Rashmi on June 27, 2018, 10:45:49 PM
ये उन सब के लिए जिन्हें पड़ते पड़ते मैं नतमस्तक हो जाती हूँ
और प्रशंसा के लिए शब्द बहुत छोटे पढ़ जाते हैं ☺

सुनो
ये जो तुम लिख लेते हो न!
इतना गहरा!
इतना संवेदनशील!
निराले ढंग से !
न जाने विचारों
का कौन सा कुआं
खोद लेते हो
देवता बन
सागर मंथन कर निकली
अमृतमय
तुम्हारी कविताएँ
निरुत्तर कर देती हैं
भाव मन के भीतर
कहीं गहरे उतर जाते हैं
तुम शायद सोचते होओगे
के मैं सराहना क्यों नहीं करती
सराहना मेरे अंग अंग
नें नृत्य करती है
परंतु प्रतिउत्तर के
लिए शब्द भी तो
चाहिए न
और मेरे शब्द
मौन धारण कर
बैठे हैं
शायद
किसी उपवास पे है कुछ दिन
किसी नई
कविता की तलाश में
जो सिर्फ मेरी हो
भूखे शब्द
कहाँ से जान लाएं
छप्पन भोगमय
कविता को सराहने को
रुको!
लौट आने दो मेरे शब्दों को
उपवास से  ☺